Saturday, April 10, 2021

podcasting kya hai... bazaar main iski pahuch


पॉड़कास्टिंग से मैं क्या समझती हूँ।

पॉड़कास्टिंग मेरे लिए नया शब्द नहीं है। इसके बारे में मैं तब से जानती हूँ, जब मैंने भारतीय जन संचार संस्थान में पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए एड्मिशन लिया था। वहा हिन्दी जर्नलिज़्म के साथ ही र   redio aur tv के क्षेत्र में काम करने की बेसिक जानकारी भी प्रदान की जाती थी। तभी से मैं पॉड़कास्टिंग और कम्यूनिटी रेडियो और रेडियो ब्राडकास्टिंग और एफ़एम रेडियो के बारे में जानती हूँ। पॉड़कास्टिंग के बारे में बहुत समय से पढ़ रही और सुन भी रही। यह  नया माध्यम है। अभिवयक्ति का। हम मानुष खुद को बताने और जताने उर अपने अनुभव साझा करने के लिए भाषा और शारीरिक भावभंगिमा का सहारा लेते हैं। जिसे आज कल समानय समझ जाता है। पूरी धरती पर मानव जाती ही है जो अपनी कहा कह सकती है लिख सकती है। हमारे वेद और पुराण पहले श्रुति आधारित थे। सब जानते हैं। यानि गुरु शिष्य को सभी श्लोक सुनता थे और शिष्य उसे याद करते थे। सो पॉड़कास्टिंग हमारी परंपरा का हिस्सा है। बस आज 21वी सदी में इसका नाम बादल गया है। ये विदेशी भाषा में है इसलिए ये नया है। मुझे याद है मेरे बचपन में मेरे गाँव में आलह और उदल की कहानी सुनने वाला आता था। वो संगीतबद्ध लय में वीरगाथा सुनता था और हम सब सुन कर वीर रस से भर जाते थे। बचपन था इसलिए कल्पना और भाव आती पर था। तो मेरे लिए पॉड़कास्टिंग शब्द नया है। इसको अपलोड करना और डौन्लोड करना नया है। इनेटर्नेट पर इसको कभी भी सुन लेना नया है । हाँ ये नया है, नॉन मीडिया पर्सन के लिए और भारत की जनता के लिए वैसे ही जैसे योगा और ध्यान।

 

पॉड़कास्टिंग क्या है? पॉड़कास्टिंग एक ओडिओ कंटैंट फ़ाइल जैसा है, जैसे रेडियो प्रसारण होता है। जिसे कम्प्युटर और एमपी3 प्लेयर और स्मार्ट फोन में इंटरनेट की मदद से डाउनलोड कर। एक फ़ाइल के रुप में सेव कर सकते है। और इस फ़ाइल को कभी भी पुनः नेट की मदद से डाउनलोड कर सुना जा सकता है। आप इसे साउंड कंटैंट भी कह सकते हैं। जैसे फोटो एक कंटैंट होता है। वैसे ही किसी भी विषय पर बातचित को या किसी के इंटरव्यू को जब कोई केवल आवाज के रूप में किसी डिवाइस में रिकॉर्डर करके सेव किया जाता है। और फिर उसको पब्लिक के लिए या चुने हुए दर्शक के लिए ओडियो फ़ाइल के रूप में नेट की हेल्प से किसी पॉड़कास्टिंग प्लाट फोरम पर या रेडियो के द्वारे या यू ट्यूब पर ब्रोडकास्ट करते हैं। ओडिओ कंटैंट को पॉडकास्ट कहते हैं। और इस प्रक्रिया को पॉड़कास्टिंग कहते हैं। हिन्दी में इसे अगडनीय संज्ञा कह सकते हैं। पॉड़कास्टिंग सुनने लायक और सीखने लायक स्टोरी और सब्जेक्ट मेटेरियल होता है। जैसे म्यूजिक का ओडियो रूप। यह दो लोगों की बातचित के रूप में या किसी दृश्य या कहानी के वर्णन या प्रस्तुति जैसा भी हो सकता है। जैसे महाभारत में संजय ने धृतराष्ट के लिए कुरुक्षेत्र की घटना का सदृश्य वर्णन किया था गीता सार के साथ। यहा हम वक्ता को सुनते है और अपने दिमाग में उस घटना या कहानी या दृश्य को बुनते हैं। ऐसा मेरा मानना है। 

मजे की बात है आज इसे पॉड़कास्टिंग कहते हैं। पर भारत में ये हमेश रहा बस आज की पीड़ी इससे अंछुई है। कैसे हमारे बचपन में नानी और दादी, मासी और मामा और चाचा हमे कहानी सुनते थे। बेड टाइम स्टोरी। जिसको सुन कर 90 के दशक के लोग तो बड़े हुए पर 21वी सदी का बच्चा इन कहानियों से जुड़ नहीं पाया या हम उससे जोड़ नहीं पाये। खैर पॉडकास्ट कोई भी ऐसा कंटैंट है जो ओडियो के रूप में होता है। उसे ही हम पॉडकास्ट कहते हैं। जब इस पॉडकास्ट को किसी ऐसे मंच पर प्रस्तुत करते हैं। जहा से कोई भी इससे सुन सके तो उस प्रक्रिया को पॉड़कास्टिंग कहते हैं। इससे हम अपना खुद का रेडियो स्टेशन भी कह सकते हैं।

 

अब बात करते हैं पॉड़कास्टिंग कैसे होती है।

सबसे पहले अपना पॉडकास्ट बनाए, टॉपिक के अनुसार। फिर इससे अपलोड करने के लिए आपको प्लैटफ़ार्म या मंच की जरूरत होगी। आपके पॉडकास्ट की कास्टिंग के लिए आपको सही मंच चुनना होगा। बहुत से पॉडकास्ट मार्केट में है।  जैसे पॉड बीन और स्प्रेयकर ।

अगर आपका ब्लॉग और वैबसाइट है तो वहा भी कुछ सॉफ्टवर लाइक सिरीऔसली सिम्पल पॉडकास्टिंग की हेल्प से अपना पॉडकास्ट वेब होस्टिंग में संरक्षित कर एक नॉर्मल आर्टिकल पोस्ट की तरह पॉडकास्ट को अपने ब्लॉग में जोड़ सकते हैं। ताकि आपकी आडियन्स या दर्शक इसको सुन सके। पॉडकास्ट बनाने  करने की लिए आप माइक्रोफोन और अपने स्मार्ट फोन को भी उपयोग कर सकते हैं। आजकल स्मार्ट फोन में ही कैमरा, टीवी और रेडिया है। इसलिए स्मार्ट फोन पॉडकोस्टिंग के लिए सही है।

 

बहुत शोध के बाद पता चला है कि पॉड़कास्टिंग व्यापार के प्रचार का नया तरीका भी बन रहा है। यह अमेरिका और यूरोप में बहुत ज्यादा प्रचलित और उपयोगी है। वहा पॉड़कास्टिंग फैसन में है। वहा पर यानि विदेश में लोग पॉड़कास्टिंग में बहुत रुचि लेते हैं और वहा बहुत ज्यादा प्रतियोगिता भी है, पॉड़कास्टिंग के एरिया में। पर भारत में ये अभी नया है। या यू कहे लोग अभी इसके बारे में कम जानते हैं। पर जल्द ही ये फैशन बन जाएगा। पर अभी भी इसमे बहुत स्कोप है। पॉड़कास्टिंग से बिज़नस बूम के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। आपका ब्लॉग है उस पर पॉडकास्ट अपलोड करो, आपके श्रोता बड़ेंगे, क्योकि अब वो आपको सुन भी पा रहे। वो आपसे और आपके विचार से ज्यादा जुड़ रहे।  अपने ब्लॉग पर और पॉड़कास्टिंग कंटैंट में ही अगर आप किसी प्रॉडक्ट का प्रमोशन करते हो। तो आपको इंकम होगी। और श्रोता जुडने से आप और फ़ेमस होंगे। विश्वासनीयता अधिक बड़ेगी इससे आप और अधिक पब्लिक और मार्केट और फ़ालोवर जोड़ सकते हो।

 

 मेरी ही तरह बहुत से लोग लिखना और बोलन बहुत पसंद करते हैं। उन सब के लिए पॉड़कास्टिंग बिलकुल नया और मैजिकल है। इससे आप अपनी बात लोगों तक पहुचा सकते हैं। और बहुत से लोगों को इन्सपाइर कर सकते हैं। टिकटोक जैसे ही आप अपनी बहुत मजबूत फ़ैन फॉलोइंग बना सकते हो। फिर मार्केट और प्रॉडक्ट आपके हाथ में। खैर यह हुई बिज़नस की बात। यह सही विचार को लोगों तक पहुचने का सही तरीका है। क्योकि अब इंटरनेट और मोबाइल सबके पास है, तो दुनिया को अपनी आवाज और विचार के जादू से प्रभावित करना उतना मुश्किल नहीं। तो पॉड़कास्टिंग से कर लो दुनिया मुट्ठी में। वैसे भी नेट का जादू अभी तो जनता पर छाया हुआ है। नए पाकेट में पुराना माल बेचना हमारी आदत है। अरे गाना नहीं सुना क्या {नए पाकेट में तुमको बेंचे चीज़ पूरी फिर भी दिल है हिंदुस्तानी}।

 


Thursday, April 8, 2021

Positive शब्द और कोरोना

मानव जीवन में शब्दों और समय का ही खेल है. आज की कहानी 'पॉजीटिव' शब्द पर केंद्रित है. शब्द और उसका अर्थ सदैव समान होता है. फर्क पड़ता है कि हम किस भाव से कह रहे.कब कह रहे. कहा कह रहे. इसका प्रभाव सुनने वाले पर क्या पढ़ता है. हूँ  वो क्या है कि हम कभी बोलते समय सोचते नहीं. क्योंकि कभी किसी ने सीखाया नहीं. है ना. यह कहानी भी भारतीय जनता संचार संस्थान से जुड़ी है. तब कि बात है जब आईआईएससी की लिखित परीक्षा पास करके मैं दिल्ली आई साक्षात्कार के लिए. उसके बाद ही आईआईएम सी में चयन होता है. दिल्ली आने की लालसा और नयी जगह का भय. मन में महाभारत मची हुई थी. मेरे पूरे खानदान में कोई पत्रकार नहीं था. इसलिए अनुभव का आश्रय मिलना संभव नहीं था. मेरे दोनों भाइयों और मित्रों का सहयोग था. माता और पिता का स्नेह भी. पर संकट की घड़ी में किसी गुरु का साथ और हाथ होना जरूरी होता है. जो आपको उत्साह दे और मार्ग के सकंट  को हटाने और विजय का मार्ग बताये.  मेरे पास ऐसे कोई गुरु नहीं थे. तो मैंने अपनी अंतर आत्मा को अपना गुरु बनाया. क्योंकि हर व्यक्ति को जीवन में किसी भी दुविधा से केवल यह आत्मा ही बाहर निकालती है. यह जीवन के आरंभ से अंत तक हर पल हमारे सही और गलत चयन पर सुझाव देती है. इसमें ईश्वर का वास होता है. और ईश्वर से बड़ा गुरु कोई नहीं. बस अपनी इच्छा और मन की सरलता लेकर पहुंचे दिल्ली. पूर्णतः आश्वस्त कि हर बात पर सरल रह कर जवाब देना है सकारात्मक रहना है. जिसे पॉजिटिव कहते हैं. यह मेरा गुण भी है. पूरे साक्षात्कार में प्रसन्न होकर मैनें प्रश्नों का उत्तर दिया. अपने चयन के लिए निश्चिन्त थी. परंतु पहली बार में चयन नहीं हुआ. पीड़ा हुई. अति पीड़ा. परंतु फिर मन ने कहा कर्म करना हमारे हक में होता है. परिणाम तो कुछ भी हो सकता है. क्योंकि आवश्यक नहीं आपकी सकारात्मक हर किसी को रास आये. कुछ हफ्ते बाद मेरा चयन हो गया. यह ईश्वर की ओर से दिया गया पुरस्कार था. कहते हैं ना मन की हो तो अच्छा, नहीं हो तो ईश्वर इच्छा. क्योंकि वो जो आपको देता है वो उत्तम होता है. तो अब मैं जेएनयू कैंपस में थी. उत्साह और आनंद से भरपूर. जब हमारी क्लास शुरू हुई तो टीचर लोग आये  और सबने अपना परिचय दिया. कुछ टीचर को कुछ बच्चे याद थे. फिर एक दिन धुलिया सर आये. सबसे बात की सबका परिचय लिया. मैं क्लास में दुसरी पंक्ति में बैठी थी. सर आये सब कुछ बताया और जाते समय रुके और मेरी तरफ देख कर बोले. आपकी क्लास में कोई ऐसा है जो अति सकारात्मक है. उसका किसी से कोई पंगा नहीं हो सकता. सब एक दुसरे को देखने लगे. सर बैठे और बोले मैडम अपना नाम बतायें. मैंने अपना परिचय दिया. सर बोले आपका नाम नहीं याद था परंतु साक्षात्कार के बाद मैंने यह जरूर सोचा कि आपका चयन हुआ की नहीं. आप तो अति सकारात्मक हो. फिर क्लास को संबोधित करते हुए बोले तो किसका किसका झगड़ा हुआ अभी तक महिमा से. सब चुप. ना ही कोई मित्र था न ही कोई शत्रु. सब बस मुस्कुरा कर आपस मुझे बात करने लगे. फिर सर ने पूछा तो लगता सभी आपके मित्र हैं. मैंने कहा हां जी सर अभी तत्काल में ऐसा ही है. आगे का पता नहीं. सर बहुत जोर से हंसे. बोले अच्छा है इस गुण को बनाये रखना. बहुत काम आयेगा पत्रकारिता के मार्ग में. पर आज इस पाजिटिव शब्द को समय और कोरोना ने कितना भयावह अर्थ दे दिया है. 2020 और 2021 में इस शब्द के प्रति लोगों का भाव बदल गया. इसलिए जीवन में कुछ भी स्थित और स्थिर नहीं. सब कुछ समय के साथ बदल जाता है. आपकी सोच समय के अनुसार बदल जाती है. मैं तो आज भी सकारात्मक हूँ. परंतु मानवता और समाज और सरकार के लिए यह सकारात्मक शब्द अब भय और दुख का कारण बन चुका है. एक समय में लोग एक दुसरे को बी पाजीटिव होने का नैतिक ज्ञान दे ते थे पर अब लोग पाजीटिव नहीं निगेटिव होने में सुख अनुभव कर रहे. परंतु चयन अभी भी आपका ही है कि इस अति मुश्किल घड़ी में आप अपने भाव रुप में क्या होना चाहते हैं.  इस नकारात्मक महौल को आप केवल सकारात्मक सोच विचार और व्यवहार से बदल सकते हैं. तो बस सकारात्मक बने रहिए और सुरक्षित रहिये. उपाय और सहयोग और नियम धर्म के पालन से सब संभव है. अगर आपने कोरोना से ठीक होने वालों की कहानी सुनी या पढी है तो आपको पता होगा सब ने सकारात्मक बने रहने और दृढ़ निश्चय से ही यह जंग जीती है. तो जो अच्छा है उसे बचा कर रखना उसके लिए लड़ना जरुरी है. पर सावधान होकर. यहाँ शत्रु दिखता नहीं. बस कंही भी हो सकता है. ताक लगाये बैठा है इसलिए सकारात्मक जीवन जीना ही एक समाधान है. संतुलन ही समाधान है.

Tuesday, May 5, 2009

बेरहम दिल्ली वाले

ईंट और पत्थर के घरों में रहते-रहते और मशीनों के बीच काम करके ऐसा लगता है कि हर इंसान पत्थर हो गया है। ऐसा सोचने की वजह है, हो सकता है कि मैं गलत हूं। लेकिन जब से दिल्ली के दर्शन हुए है यह सोच और पक्की हो गयी है। 61 साल के युवा भारत में बाकी सुविधा को ध्यान रखा जाता है। मसलन सरकार ने आम आदमी के लिए बस की सेवा दी है। जिसमें युवा, बुजुर्ग, स्त्री और पुरूष , यहां तक की निर्जीव सामान के लिए भी जगह है पर उन बच्चों के लिए जगह नहीं होती जो भारत के भविष्य हैं। दिल्ली सरकार की ओर से अपने आम नागरिक को एक जगह से दूसरे जगह जाने के लिए जो बस की सेवा दी है। उसमें सरकारी निगम स्कूलों से निकले बच्चों के लिए कोई जगह नहीं होती। उनके पास बस में सफर करने के लिए पैसे नहीं होते। यह जानकर कंडक्टर उन बच्चों को पहले तो बस में चढ़ने नहीं देते । अगर वो चढ़ गये तो कंडक्टर उन्हें डांट कर बस से उतार देता है। उसके इस काम का विरोध करने के बजाय लोग कंडक्टर का साथ देते हैं। मुङो समझ नहीं आता की इन मासूम बच्चों क ो चिलचिलाती धूप में बस से उतारने में उन्हें जरा भी अजीब नहीं लगता। मुङो जहां तक पता है छोटे बच्चों का बस और ट्रेनों में टिकट नहीं लगता।

Friday, March 27, 2009

चुनावी फार्मूलों की राजनीती

१५ वें लोक सभा के चुनाव की तारीके पड़ चुकी हैं .लेकिन पुरे भारत की सता को चला सकने की स्थिति में कोई भी दल या गटबंधन दिखाई नही देता .सभी बड़े राष्ट्रीय स्तर की पार्टियाँ अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए छोटी और प्रादेशिक स्तर की पार्टियों पर निर्भर हो गईं हैं.न तो भाजपा ,न ही कांग्रेस और न ही तीसरा मोर्चा .जो अभी न ही संगठित है न ही उसकी कोई स्थायी संरचना है। लेकिन बसपा की आलाकमान मायावती के इस मोर्चे के साथ सहयोग देने की बात ने इसे एक जमीं दी है क्योकि जिन चार वाम दलों की जुगत से ये मोर्चा तैयार हुआ है जिसमे पॉँच और छोटे प्रादेशिक दल है .उसकी वैधानिकता कांग्रेस का साथ छोड़ने के बाद से ही ना के बराबर रह गई है इसलिए तो उसने मायावती की मनसा समझ कर उन्हें तीसरे मोर्चे में लाने के लिए प्रधानमंत्री पद के उमीदवार के रूप में दिखाया । ताकि जनता उनके किए को भूल जाए .क्योकि वो जानते थे की भारतीय जनता दिखाती बेवकूफ है लेकिन है बड़ी चालू तभी तो ४ वें आम चुनाव में कैसे कांग्रेस को पटखनी दी .इतना दूर जाने की क्या जरुरत है .१४ वें आम चुनाव में ही भाजपा को ही कहीं मुहं दिखने लायक नही छोडा.इस बार वो इन नेतावो और इनकी पार्टी का क्या करेगी .ये तो चुनाव के परिणाम ही बताएँगे .लेकिन अगर हम राजग को या संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की स्थिति को देखें तो पता चलता है की दोनों की ही जड़ें हिल चुकी हैं .संप्रग के साथी लालू पासवान और तो और मुलायम भी इनका साथ छोड़ कर अपने दम पर चुनाव लड़ रहे हैं .और वही राजग के साथी नेता उनका साथ छोड़ कर किसी और दल से उमीदवार बनकर अपनी ही पार्टी के खिलाफ लड़ने को तैयार है.भाजपा की स्थिति अपने ही जन्म स्थल में कमजोर हो रही है उसमें चार चाँद लगाया पीलीभीत के उमीदवार वरुण गाँधी ने ६ मार्च को सांप्रदायिक भाषण देकर के .मुझे ऐसा लगता है की वरुण से ये भाषण सोच समझ कर दिलवाया गया है ताकि जनता के मतों का धर्म और जाति के आधार पर ध्रुवी करण हो सके .वैसे भी भारत की जनता का धर्म और जाति के आधार पर हमेसा अपने ही नेतावो ने फायदा उठाया है.तभी तो कांग्रेस के सर्वाधिकारवाद को तोड़ने के लिए उन्होंने अजगर का सामाजिक समीकरण वाला फार्मूला इजाद किया चो. चरण सिंह ने . अजगर यानि अहीर ,जाट ,गुजर ,और राजपूत .इसी का विस्तार था मजगर .सियासी खेल खेलने वाले इन नेतावों ने अजगर समीकरण में मुस्लिमों को लाने के लिए मजगर बना दिया .लालू जी ने ऍमवाई यानि की मुस्लिम-यादव के रसायन से पन्द्रह साल तक काम किया लेकिन पिछले चुनाव में मुलायम सिंह ने एक कदम आगे चल कर दलित -मुसलिम -यादव यानि की डी ऍम वाई का प्रयोग किया .

लेकिन इस फार्मूले के लागु होने से पहले ही शेर पर सवा शेर मायावती जी ने मुलायम के इस समीकरण को फेल कर दिया .अपनी सोशल एन्गीनियारिंग का कमाल दिखाया और वो सता में आगई .जिस ब्रह्माण वाद के खिलाफ कासी राम जी ने बसपा की नीव डाली थी .उसी ब्राहमण समुदाय की मदद से वो उतर प्रदेश की सता में आई .ऐसा नही है की सिर्फ़ उतर भारत में ही ऐसे फार्मूले इजाद हुए .कर्णाटक और आन्ध्र में मामूली यानि मारवाडी ,मुस्लिम और लिंगायत एक तराजू में तोले गए .भारत की राजनीती में वो परिवर्तन का समय था जो अभी भी चल रहा है जिसे समझ कर ये प्रादेशिक दल उभरे .लेकिन हमारे देश का प्रतिनिधित्व करने वाले राष्ट्रिय नेतावों और दलों के लिए इस परिवर्तन को समझ पाना आसान ना था क्योकि उन्होंने हमेसा माना की भारत एकता में अनेकता का देश है लेकिन इस अनेकता को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश नही की .जिसके कारन ये प्रादेशिक स्तर के नेता और दल उभरे और भारतीय राजनीती का अंग हो गए .आज पुरी भारतीय राजनीती पर हावी है.लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है की अजगर से मामूली तक सारे फार्मूले इन नेतावो की लालच के आगे छोटे पड़ गए .ऐसा नही होता तो मायावती कभी अपने दलित वोट बैंक को ब्राह्मणों और मुसलमानों से जोड़ने की कोशिश नही करती .आज वो कांग्रेस के पुराने वोट बैंक पर काबिज हैं ।


कांग्रेस ने लम्बें समय तक इसी दलित ब्रह्मण और मुस्लिम समीकरण पर काम किया .अब मायावती राष्ट्रीय ताकत बनकर उभर रहीं हैं .फर्क बस इतना है की पहले ऊपर सता में ब्राहमण थे .अब दलित नेता विराजमान है.

Wednesday, March 25, 2009

ख्वाब है तो मंजिले है

जिंदगी है..... तो घूमते रहो ???

जिंदगी है तो ख्वाब है_ख्वाब है तो मंजिलें है____मंजिलें है तो फासले है__________फासले है तो रास्ते है_________रास्ते है तो मुश्किलें है____________ _मुश्किलें है तो हौसला है____________ _____हौसला है तो विशवास है____________ _________ _विश्वास है तो जीत है ..............जीत है तो खुसिया हैं ...........खुशिया है तो और खवाब हैं ..................जब ख्वाब है तो जिन्दगी है .

ये लाइन मैंने टीवी पर तब सुनी थी जब गुलजार जी का एल्बम आया था .उसी समय से ये लाइन मुझे पसंद है कल ये लाइन मुझे विष नाम के बन्दे जिसने गरीब रथ की गरीबी पर अपनी प्रत्रिक्रिया दी थी के ब्लॉग से मिला मेरे कॉलेज के लैब के बंद होने का टाइम होने के कारन मैंने इसे पुरा धयान से पढ़ा नही की इसमे उस बन्दे की अपनी भी राय शामिल है.अभी मैंने देखा तो पता चला की ऊपर की लाइन ही मेरी पसंद की है और तो विष महासय के अपने विचार है .इसलिए मैं पहले के पोस्ट को हटा कर केवल अपनी पसंद की लाइन ही रख रही हूँ.उसके आगे मेरे हिसाब से ये लाइन होनी चाहिए .रही बात दुनिया के गोल होने की तो ये सच है.क्योकि इस दुनिया में जब आप किसी अपने से दूर होते है तो वो आप को इसी दुनिया में मिलता है .क्योकि इस दुनिया के अलावा कोई और सच है भी तो नही .किसी मूड पर किसी से मिलना फ़िर दूर होना फ़िर उससे मिलने की चाहत हमारी कोशिशे और विशवास ही हमें उससे मिलाता है .इसी मिलने -दूर होने का नाम तो जिन्दगी है.हम जिन्दगी के हर पडाव पर नए लोगो से मिलते हैजो अपने बनते है अलग हो जाते है.फ़िर हम आगे बड़ते है नए होसले के साथ उन अपनों की याद लिए जो फ़िर मिल जाते है। किसी मोड पर .

Saturday, March 21, 2009

गरीब रथ की गरीबी




होली की छुटी में घर जाने के लिए डेल्ही से बनारस जाने वाली सारी गाड़ियों में सीट देखा ,लेकिन सभी में सीट फुल थी या वेटिंग में थी .घर वालो से मैंने बोल दिया की में नही आ रही हूँ .फ़िर 'जहाँ चाह वहा राह ' वाली कहावत जैसा कुछ हुआ .मेरे जीजा जी को मेरे टिकट न मिलने की ख़बर मिली उन्होंने तुंरत गरीब रथ और समर स्पेशल में वेटिंग की ही टिकट ले ली .मेरे जाने के पहले ही गरीब रथ की टीकट कन्फर्म हो गईं.मैंने मेरे जीमेल से टिकट का प्रिंट आउट निकाला .९ मार्च को शाम ६ .३० पर मेरी ट्रेन पुरानी डेल्ही से थी .मैं और अनु एक साथ स्टेशन के लिए निकले .अनु को नई डेल्ही छोड़ कर मैं पुरानी डेल्ही गई .वहा पहुची तो गरीब रथ लेट थी .ये रथ किस प्लेटफार्म पर आयेगी ये पता ही नही चल रहा था .फ़िर पूछ -ताछ केन्द्र से पता चला कि ट्रेन 3 नम्बर पर आरही है . ६.३० के बजाय ट्रेन ७.०० बजे चली .ऊपर वाले कि कृपा से चली तो .ट्रेन में जी ३ मेरा डिबबा था .जिसमे २३ मेरी सीट थी .अपने सीट पर पहुच कर मैनेसामान रखा मेरे कम्पार्टमेंट में मुझे छोड़ कर ८और लोग थे जिसमे एक दादी जी एक लड़की और५ लड़के और एक अंकल थे .हम सब लोग अजनबी थे .कोई किसी से बात नही कर रहा था .गरीब रथ पुरी एसी है .रेड और व्हाइट रंग की गरीब रथ में १५ डिब्बे थे .ट्रेन के चलते ही एसी ऑन हो गया ।मेरी उपर वाली सीट थी.
कॉलेज में होली खेलने के कारन थोड़ा थकान थी,इसलिए ऊपर जाकर मैं सो गई .मेरे साथ के यात्रियों में एक लड़का था जो थोड़ा चंचल स्वभाव का था .वो भी अपने कॉलेज से होली खेल कर आया था .जिसके कारन उसे सर्दी हो गई थी.वो भी मेरे सामने वाली सीट पर लेट गया .मैं अपने फ्रेंड से फ़ोन पर बात कर रही थी .तभी उसका भी फ़ोन आया .वो अपने छोटे भाई से बात कर रहा था .की वो सोच रहा है की गाड़ी ले ले .इस बार वो अपने पापा से इस बारे मैं बात करेगा .पहले उसने बड़ी -बड़ी गाडियों के नाम लिए फ़िर अंत मैं बाईक पर आगया .मुझे उसकी बात सुनकर हसी आई पर मैंने उसे जाहिर नही होने दिया.वैसे एसी ट्रेन में मेरा ये पहला सफर था.लेकिन मुझे पता था की एसी ट्रेन मैं कम्बल और टाइम से खाना ,नास्ता मिलता है.और मजे की बात ये थी की मेरे साथ बैठे कई लोग का ये एसी से पहला सफर था क्योकि किसी को भी किसी और गाड़ी का तिक्कत नही मिला था .और गरीब रथ की ये तीसरी या चोथी यात्रा थी डेल्ही से बनारस की.क्योकि वो २ मार्च को ही पटरी पर लायी गई थी.नई ट्रेन का नयापन झलक रहा था.अन्दर -बहार से ट्रेन साफ सुथरी थी .सब लोगो अपने -अपने सीट पर बैठ कर नास्ता पानी के लिए पेंट्री वालो का इंतजार कर रहे थे .तभी मेरे सामने वाली सीट बार बैठे उसी लड़के को सर्दी लगने लगी वैसे सर्दी तो सभी को लग रही थी .वो निचे उतरा और लोगो से पूछा भइया हम सुने थे की एसी ट्रेन मैं कम्बल और नास्ता , पानी सब टाइम पर हाजिर होता है यहाँ २ घंटे हो गए न तो कम्बल वाले दिखे न ही चाय पानी वाले .ऊपर से एसी चला दिया है .वो उठा कम्पार्टमेंट से बहार जा कर एसी ऑफ़ कर आया उसके इस कम से सब को रहत मिली क्योकि सब लोगो को ही ठण्ड लग रही थी .अभी सब लोगसोच ही रहे था की क्यो पेंट्री वाले नही आ रहे तब तक टीटी साहब आते दिखे .उनके आते ही उसी बन्दे ने झट से पूछा सर कम्बल और चाय पानी मिलेगा .टीटी ने ताका सा जवाब दिया .नही मिलेगा क्योकि पुरे १५ डिब्बे की ट्रेन में केवल ६० कम्बल ही है.ये सुनकर तो सारे लोगे चकित रह गए वो बंद फ़िर बोला जब कम्बल नही मिलेगा तो हम आप को टिकट भी नही देंगे .पैसा देकर भी खाने पिने और ओड़ने के सामान के लिए तरस रहे है .इससे बेहतर होता की पैसेंजर से जाते कम से कम इतना पैसा तो नही लगता ।
आप कम्बल नही दिलाएंगे तो कोण दिलवाएगा .टीटी ने कहा जा के लालू जी से कहिये की वो आप को कम्बल दे .मेरा काम टिकट देखना है न की कम्बल और खाना बाटना टीटी की ये बात सुनकर मेरे ही कम्पार्टमेंट में बैठे अंकल को गुस्सा आगया .उन्होंने टीटी को कहा ये बताईये की लालू जी आप के नोकर है या आप लालू जी के जो वो यहाँ आकार हमे कम्बल देंगे जरा अपने सुपरवाईजर का नम्बर देना उनको बात दूँ की अब लालू जी ट्रेन में कम्बल और चाय पानी की जिमेदारी संभाले
.वो अंकल सरकारी ऑफिसर थे .टीटी उनकी बात सुन कर सॉरी सर मेरा मतलब ये नही था कहने लगा तब उन्होंने कहा जाओ अपने सीनियर को बुलाकर लाओ तुमसे टिकट कोई चेक नही कराये गा .टीटी चुप चाप चलता बना .थोडी दर में एक उर टीटी के साथ हमारे पास आया .फ़िर सब लोगो ने चुप -चाप टिकट दिखा दिया .टीटी के आने के पहले ही मेरे कम्पार्टमेंट के पांचो लड़के खाना लेने चले गए थे ,पेंट्री १५ वें डिब्बे में थी .वह से एक कंटेनर खाना लेकर वो लो ३० मिनट में आए करीब रात के १०.३० हो रहे होंगे .फ़िर सबने खाना खाया .खाने में वेग बिरयानी था .चावल कचे थे सभी ने थोड़ा सा खा के .और जो डिब्बे हम लोगो ने जयादा ले लिया था उसे हमारे डिब्बे में खाना न पाने वालो को दे दिया गए .इसके बाद हम सब लोबात करने लगे की ये सफर जिंदगी भर याद रहेगा .अब कभी खाना , पानी और कम्बल के बिना किसी सफर पर नही जायेंगे .फ़िर सब लोग इस बात से उबरने के लिए लैपटॉप मैंने डेल्ही ६ देखने बैठ गए थोड़े देर बाद सभी अपनी -अनपी सीट पर जा कर लम्बी तन कर सो गए .सुबह उठे तो कुछ लोग जा चुके थे .बस बनारस जाने वाले लोग ही बचे थे .फ़िर मैं सीट से निचे आई एक कप चाय किस्मत से मिल गई .फ़िर उन्ही अंकल से रात के मेड पर बात होने लगी .उनसे हम लोगो ने कहा इसका उपाय क्या है तो उन्होंने कहा उपाय तो है की ट्रेन से उतर कर अपनी प्रतिक्रिया रेलवे की नूत बुक में लिखे लिकिन कोई ऐसा करता नही समस्या होती है उसे झेलते है फ़िर भूल जाते है ऐसा नही होना चाहिए हम लोगो को उससे नोट बुक मंगा कर अपनी शिकायत लिखनी चाहिए थी ये और बात है की वो हमे नोट बुक लाकर नही देता .

Thursday, March 19, 2009

वो तीन राते

एक दिन क्लास में प्रधान सर ने एलुमनाई मीट की बात करते _करते आनेवाले ८ मार्च को 'महिला दिवस ' पर महिला विशेषांक निकलने की जिमेदारी हम १४ लड़कियों पर डाली .हमने बड़े उत्साह से ये जिमेदारी ले ली .फरवरी के तीसरे हफ्ते से हम लोगो ने आपस में बात -चीत करके निर्णय किया कि हम अपने पेपर में किस मुद्दे को उठाएंगे .फ़िर प्रधान सर से हमने अपना आईडिया शेयर किया .सर ने भी हमे पेपर के लिए ढेर सारे सुझाव दिये.फ़िर उन्होंने हमे अनिल सर कि मदद लेने को कहा .सर से बात करके हम लोगो ने अपने काम बाट लिए .फ़िर सभी लड़कियों ने १४ महिला पत्रकार का इंटरव्यू लिया और अपने अनुभव भी लिखे .इसके अलावा महिला प्रेस क्लब की सचिव ,ब्लॉग की दुनिया में महिला का रोल ,देल्ही में काम करने वाली बंगला देशी महिलाओ के बारे में और अपनी संस्था से पास आउट लड़कियों की स्टोरी के साथ ही भारतीय जन संचार संस्थान के लड़के और लड़कियों के बीच एक सर्वे कराया .जिसका परिणाम बड़ा ही चोकानेवाला था .

कि मीडिया में आने वाली ९५ प्रतिशत लड़किया प्रेम विवाह या अपनी मर्जी से विवाह करना चाहती हैं । जबकि केवल ३५ प्रतिशत लड़के इसके पछ में थे.साथ ही लड़किया पिता की सम्पति में हक नही चाहती थी पर लड़के उन्हें ये अधिकार देने को तैयार थे.लड़कियों ने माना की प्रकृति ने उन्हें शारीरिक रूप से कमजोर बनाया है वो अपनी रक्छा लड़को की तरह नही कर सकती .वही लड़को ने माना कि लड़किया अपनी रक्झा स्वयं कर सकती है ।

हम लोगों को २ मार्च तक सारा मटेरियल सर को दिखाना था .उस दिन तक सभी ने अपना काम लगभग कर लिया था .२ मार्च की मीटिंग में सर ने मटेरियल देखने के बाद पेपर के लेआउट को समझाया .साथ ही एक गुरु मंत्र दिया कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना जरुरी है .हम लोगो ने सर की बात को गाढ़ बांधा .ऐसा नही था कि हम मेहनत नही कर रहे थे पर उस वक्त हम लोग अकेले -अकेले अपना काम कर रहे थे .टीम की तरह काम करना और उसका क्या मजा होता है ये तो हम लोगो को उन तीन दिनों में पता चला जब हम १० लोग हॉस्टल में पेपर का लेआउट डिजाईन , एडिटिंग और प्रूफ़ रीडिंग करके पेपर तैयार करने में तीन रात सोये ही नही .८ बजे खाना खाने के बाद सब किसी एक के कमरे में अपने -अपने लैपटॉप के साथ इकठा होते और फ़िर काम पर लग जाते .एक कमरे में १० लोग, ६ लैपटॉप ,एक बेद वाले रूम में तीन गद्दे या चटाई बिछा कर दस लोग एक -दुसरे की कापिया पढ्ते औरो को सुनाते फ़िर लोट -लोट कर हस्ते फ़िर उसे सही करते .दिन में क्लास और रात में पेपर का काम .हमारी तीन रात और दिन की मेहनत में हम लोगो को बहुत कुछ शिकने को मिला तो साथ ही हम दस एक दुसरे को जानने लगे अभी तक हमारी जान - पहचान थी अब हम दोस्त है इसके अलावा जो सबसे अहम् बात सामने आई वो थी की हमलोगों में केवल सुरभि को लेआउट आता था .औरो को नही.इस कमी से हम लोगो को पेपर तैयार करने में बड़ी मुस्किल हुई .क्योकि ६ लैपटॉप के साथ ६ पेन ड्राइव थे .जो वायरस से फुल थे .जिसके कारन ६ की रात हमारा ८ पेज बनने के बाद भी ३ पेज तीन बार गायब हुआ . सुबह १० बजे तक पेपर तैयार करके देने की हमारी डेड लाइन थी .८ बजे तक हमारा पेपर तैयार था लेकिन अचानक फ़िर तीन पेज गायब हो गया .ये हमारे सब्र की इंतहा थी फ़िर से हमने तीन पेज की स्टोरी एडिट की सुरभि ने फ़िर उसका लेआउट बनाया .अंततः ११.३० बजे हमने सर से ऍप्लिकेशन साइन कराया और पेपर की सॉफ्ट कापी प्रेस में दे दी, जो हमें शाम तक मिली .पेपर के पुरा होने की खुशी थी साथ ही ७ मार्च को पेपर के विमोचन की खुशी उसे और बढ़ा रही थी .आपको ये जानकर अजीब लगेगा की ६ मार्च को सुरभि का जन्म दिन था हम लोगो ने सुरभि को बिना बताये उसका बर्थ डे मानाने का प्लान बनाया .फ़िर हमने चोरी से केक ,कोल्ड ड्रिंक ,चिप्स वगर मगाया .रात के १२ बजे हमने उसे विस किया . थोडी मस्ती की फोटो खिचवाया फ़िर सब लोग अपने काम पर लग गए .अजीब तब लगता था जब सुरभि का फोन आता था ,उसे बर्थ डे विश करने के लिए तो हमें नही चाहते हुए भी उसे ये कहना पड़ता था ,की सुरभि कल बात कर लेना आज कह दो तुम काम कर रही हो .लेकिन सुरभि ने हमारी बात का बुरा नही माना .वो कम मैं लगी रही .५ और ६ तारीख को हम में से कोई क्लास नही गया .सुबह से हॉस्टल मैं ही पेपर की एडिटिंग और लेआउट ,प्रूफ़ रीडिंग में लगे रहे .ये तीन दिन हम सभी के जीवन के होस्टल लाइफ के सबसे अच्छे पल थे .क्योकि इससे पहले हम लोगे परिचित थे लेकिन अब हम सब अच्छे दोस्त है.एक साथ काम कर के हमे बहुत अच्छा लगा .इस पेपर 'तेवर ' ने हमे पत्रकार बना दिया .इससे जुड़े कई अच्छे अनुभव है जो हम लोगो को ता उम्र याद रहेंगे .